झारखंड हाईकोर्ट ने जमीन की रजिस्ट्री से जुड़े एक अहम मामले में राज्य सरकार को नेशनल जेनेरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम (NGDRS) पोर्टल पर दर्ज प्रतिबंधित जमीनों की सूची तत्काल हटाने का निर्देश दिया है। जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने गुरुवार, 5 नवंबर को यह आदेश हजारीबाग निवासी अमित रंजन की रिट याचिका पर दिया। अदालत ने राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव को इस बारे में सभी जिलों के उपायुक्तों को सर्कुलर जारी करने को कहा है।
क्या था मामला
याचिकाकर्ता ने हजारीबाग जिले के बोंगा गांव में अपनी 42 डिसमिल जमीन को प्रतिबंधित सूची से हटाने की मांग की थी। यह जमीन रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 22-ए के तहत बनी सूची में दर्ज थी और उपायुक्त को आवेदन देने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हो रही थी। अदालत ने याद दिलाया कि हाईकोर्ट की खंडपीठ पहले ही धारा 22-ए और 26 अगस्त 2015 की संबंधित अधिसूचना को निरस्त कर चुकी है।
सरकार की दलील और अदालत का रुख
राज्य की ओर से महाधिवक्ता ने बताया कि खंडपीठ के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दो विशेष अनुमति याचिकाएं लंबित हैं और सरकार नया कानून लाने की प्रक्रिया में है। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है और जब तक नया वैधानिक प्रावधान नहीं आता, निरस्त कानून और अधिसूचना के आधार पर कार्रवाई नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट के के. गोपी बनाम सब-रजिस्ट्रार फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि सब-रजिस्ट्रार का काम दस्तावेज का निबंधन करना है, मालिकाना हक तय करना नहीं। अगर दस्तावेज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 और बिहार रजिस्ट्रेशन रूल्स, 1937 की शर्तें पूरी करते हैं और स्टांप व निबंधन शुल्क जमा है, तो रजिस्ट्री से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही अदालत ने साफ किया कि सिर्फ रजिस्ट्री हो जाने से जमीन पर वैध मालिकाना हक नहीं मिल जाता, और लोगों को सुनवाई का मौका दिए बिना उनकी जमीन प्रतिबंधित सूची में डालना उचित नहीं है।
(स्रोत: प्रभात खबर, हिन्दुस्तान, अमर उजाला)


टिप्पणियाँ
इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।