NEWS 7 JHARKHAND
शुक्रवार, 6 नवंबर 2026
विज्ञापन
NEWS 7 JHARKHAND — YouTube पर सब्सक्राइब करें
NEWS 7 JHARKHAND — विज्ञापन दें

छठ से पहले काठीकुंड के कुसुंबा में सूप-डाला बनाने में जुटे 200 से ज्यादा मोहली परिवार, त्योहार पर दोगुने हुए दाम

सामान्य दिनों में 20 रुपये का सूप छठ में 40 रुपये तक; बांस की कमी और सरकारी योजनाओं की जानकारी न होना कारीगरों की बड़ी चुनौती

छठ से पहले काठीकुंड के कुसुंबा में सूप-डाला बनाने में जुटे 200 से ज्यादा मोहली परिवार, त्योहार पर दोगुने हुए दाम
फाइल फोटो: दुमका में बांस के उत्पाद बनाती महिलाएं | फोटो: Jaimoen87 / Wikimedia Commons (CC BY-SA 3.0)

लोक आस्था के महापर्व छठ से पहले दुमका जिले के काठीकुंड प्रखंड में मोहली समुदाय के कारीगरों की व्यस्तता बढ़ गई है। प्रखंड के कुसुंबा गांव में ही 200 से ज्यादा मोहली परिवार बांस से सूप और डाला बनाने की पारंपरिक कारीगरी से जुड़े हैं। प्रखंड के कई दूसरे गांवों में भी यह काम होता है। छठ में इस्तेमाल होने वाले इन सामानों की मांग बढ़ने के साथ उनकी कीमत भी बढ़ गई है।

धानरोपनी के बाद शुरू होता है काम

कारीगर धान की रोपनी पूरी होने के बाद यह काम शुरू करते हैं और करीब दो महीने तक लगातार निर्माण चलता है। छठ के लिए बनने वाले सूप-डाला का आकार और बनावट सामान्य दिनों से अलग होती है, ताकि व्रतियों को पूजा सामग्री रखने और अर्घ्य देने में सुविधा हो। बांस छीलकर पतली पट्टियां बनाना, फिर उन्हें बुनकर आकार देना काफी मेहनत का काम है। बताया जाता है कि एक व्यक्ति दिनभर में औसतन चार से पांच डाला ही बना पाता है।

कितना बढ़ा दाम

  • डाला: सामान्य दिनों में 30-40 रुपये, छठ के दौरान थोक में 70 रुपये प्रति पीस तक।
  • सूप: सामान्य दिनों में करीब 20 रुपये, पर्व के समय 40 रुपये तक।
  • गांव से 70 रुपये में खरीदा गया डाला दूसरे बाजारों में 90 से 100 रुपये तक बिकता है।

स्थानीय व्यापारी गांव पहुंचकर बड़ी मात्रा में खरीदारी करते हैं और ये उत्पाद बिहार, बंगाल और कोलकाता तक भेजे जाते हैं।

बांस की कमी बड़ी चुनौती

प्रभात खबर की रिपोर्ट के मुताबिक, अच्छे बांस की पर्याप्त उपलब्धता न होना इन परिवारों के सामने सबसे बड़ी समस्या है। कारीगरों को पारंपरिक हुनर के लिए प्रशिक्षण, औजार और मदद देने वाली पीएम विश्वकर्मा योजना की जानकारी तक नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बांस की खेती को बढ़ावा देने, कारीगरों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने और सीधे बाजार तक पहुंच दिलाने से इस पेशे से जुड़े परिवारों की आमदनी बढ़ सकती है।

(स्रोत: प्रभात खबर)

यह खबर शेयर करें
स
संपादकीय टीम · संपादकीय डेस्क

NEWS 7 JHARKHAND की संपादकीय टीम।

संपादकीय टीम की और खबरें →

टिप्पणियाँ

इस खबर पर सबसे पहले अपनी टिप्पणी करें।