विश्व प्रसिद्ध सरायकेला छऊ नृत्य की परंपरा को सहेजने और उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए सरायकेला स्थित एसएनए छऊ केंद्र ने नए कलाकारों का प्रशिक्षण शुरू किया है। केंद्र की सरायकेला छऊ नृत्य परियोजना के तहत नवप्रवेशी कलाकारों और छात्र-छात्राओं को इस नृत्य शैली का सैद्धांतिक और व्यावहारिक ज्ञान दिया जाएगा।
गुरु-शिष्य परंपरा में सीख
हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक प्रशिक्षण गुरु कुसमी पटनायक के मार्गदर्शन में चल रहा है। सहायक गुरु रजतेंदु रथ के साथ प्रशिक्षक गोपानंदु तांती, निवारण महतो, शंकु महतो और कमल कृष्ण साहू इसमें अहम भूमिका निभा रहे हैं। नए प्रशिक्षुओं में देवदास बेहरा, प्रियंका महतो, निशा कांडबुरु और श्रुति नायक शामिल हैं।
क्या-क्या सिखाया जाएगा
- सरायकेला छऊ की विशिष्ट नृत्य शैली और अंग संचालन
- शारीरिक मुद्राएं, भावाभिव्यक्ति और अभिनय
- ताल-लय और पारंपरिक संगीत
- इस नृत्य विधा की सूक्ष्म तकनीकें
मकसद: दक्ष कलाकारों की नई पीढ़ी
केंद्र के अनुसार इस पहल का उद्देश्य नई प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें तराशना, युवाओं की भागीदारी बढ़ाना और समर्पित कलाकारों की नई पीढ़ी तैयार करना है। साथ ही सरायकेला छऊ की अलग कलात्मक पहचान और पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखते हुए आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना भी परियोजना का अहम लक्ष्य है।
गौरतलब है कि यूनेस्को ने 2010 में छऊ नृत्य को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया था। इस सूची में झारखंड की सरायकेला शैली के साथ पश्चिम बंगाल की पुरुलिया और ओडिशा की मयूरभंज शैली भी शामिल हैं।
(स्रोत: हिन्दुस्तान / लाइव हिन्दुस्तान, यूनेस्को)


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