सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसले में साफ किया कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा उसी क्षण से शुरू हो जाती है, जब उसे हिरासत में लिया जाता है, न कि तब से जब पुलिस औपचारिक रूप से गिरफ्तारी दर्ज करती है। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि अगर किसी को पेशी से पहले 24 घंटे से ज़्यादा हिरासत में रखा गया, तो उसे तुरंत रिहा करना होगा। दैनिक भास्कर के मुताबिक यह मामला असम में चार लोगों को हिरासत में लिए जाने से जुड़ा था।
फैसले की मुख्य बातें
- संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत 24 घंटे की गिनती उस तारीख और समय से होगी, जब व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगी।
- इस अवधि में गिरफ्तारी की जगह से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने के ज़रूरी समय के अलावा कोई और छूट नहीं मिलेगी।
- हिरासत में लेने वाले अधिकारी को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 58 के तहत यह भी देखना होगा कि 24 घंटे के भीतर भी हिरासत की अवधि परिस्थितियों के हिसाब से उचित समय से ज़्यादा न हो।
- मजिस्ट्रेट को पेश किए गए व्यक्ति की हिरासत की वास्तविक तारीख और समय दर्ज करना होगा और जांचना होगा कि समय-सीमा का पालन हुआ या नहीं।
हाईकोर्टों की व्याख्या को बताया गलत
पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 22(2) की व्याख्या को लेकर उड़ीसा, मद्रास और केरल हाईकोर्ट के कुछ फैसले सही कानूनी स्थिति नहीं बताते। अदालत ने हिरासत में हिंसा को देश की दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई और मानवाधिकार उल्लंघन के सबसे बुरे रूपों में से एक बताया। पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत का हमेशा से प्रयास रहा है कि पूछताछ के दौरान हिरासत में कोई हिंसा न हो।
इस फैसले का सीधा असर उन मामलों पर पड़ेगा, जिनमें किसी व्यक्ति को पूछताछ के नाम पर घंटों रोके रखा जाता है और गिरफ्तारी बाद में दर्ज होती है। अब ऐसी अवधि भी 24 घंटे की सीमा में गिनी जाएगी।
(स्रोत: लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक भास्कर)


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