पूर्वी भारत में 28 अक्टूबर को आए चक्रवात अर्नब से हुई तबाही को जलवायु परिवर्तन ने करीब 33 प्रतिशत बढ़ा दिया। यह निष्कर्ष इंपीरियल कॉलेज लंदन के ग्रैंथम इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं के एक नए अध्ययन का है, जो गुरुवार को प्रकाशित हुआ। अध्ययन के मुताबिक औद्योगिक युग से पहले की जलवायु की तुलना में इस चक्रवात से कई करोड़ डॉलर का अतिरिक्त सीधा आर्थिक नुकसान हुआ।
छोटा बदलाव, बड़ा असर
शोध के अनुसार जलवायु परिवर्तन ने अर्नब की अधिकतम हवा की गति करीब 5 प्रतिशत और तट से टकराते समय उसकी ‘आईवॉल’ यानी चक्रवात की आंख के चारों ओर के घने हिस्से में बारिश की दर 11 प्रतिशत बढ़ाई। सुनने में यह बदलाव मामूली लगता है, लेकिन अध्ययन बताता है कि इसका असर नुकसान पर कई गुना ज़्यादा पड़ा। भारत में भौतिक संपत्तियों को हुआ सीधा नुकसान, पूर्व-औद्योगिक जलवायु की तुलना में 33 प्रतिशत ज़्यादा आंका गया और कुल आर्थिक नुकसान का करीब 25 प्रतिशत सीधे जलवायु परिवर्तन के खाते में गया।
कैसे हुआ अध्ययन
वैज्ञानिकों ने इंपीरियल कॉलेज स्टॉर्म मॉडल (IRIS) की मदद से अर्नब को दो स्थितियों में दोहराया। पहली, मौजूदा जलवायु, जो औद्योगिक युग से पहले के मुकाबले करीब 1.3 डिग्री सेल्सियस गर्म है; और दूसरी, ऐसी काल्पनिक दुनिया, जिसमें इंसानी गतिविधियों से तापमान न बढ़ा हो। अध्ययन के मुताबिक अर्नब के दौरान एक मिनट तक लगातार चलने वाली हवाओं की रफ्तार 202 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंची और आंध्र प्रदेश में बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हुआ। ओडिशा के कई ज़िले भी इसकी चपेट में आए थे।
इंपीरियल कॉलेज के भौतिकी विभाग के शोधकर्ता डॉ. नाथन स्पार्क्स ने कहा कि ये नतीजे निष्क्रियता की कीमत की याद दिलाते हैं। उनके मुताबिक जलवायु परिवर्तन की लागत अब भविष्य का अनुमान नहीं रही, बल्कि पूर्वी भारत के तटीय समुदाय इसे आज झेल रहे हैं।
(स्रोत: The Hindu, दैनिक जागरण)


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