दूरदराज के गांवों, जंगलों और पहाड़ी इलाकों में जहां मोबाइल टावर नहीं पहुंच पाते, वहां भविष्य में स्मार्टफोन सीधे सैटेलाइट से नेटवर्क ले सकेंगे। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने इसके लिए ‘डायरेक्ट-टू-डिवाइस’ (D2D) सैटेलाइट कनेक्टिविटी से जुड़ी सिफारिशें दी हैं। हालांकि यह सुविधा अभी शुरू नहीं हुई है और इन पर अंतिम फैसला दूरसंचार विभाग (DoT) को लेना है।
दो तरीकों से जुड़ेगा फोन
- सैटेलाइट के अपने स्पेक्ट्रम से: मोबाइल सैटेलाइट सर्विस (MSS) के तहत एल-बैंड और एस-बैंड स्पेक्ट्रम के जरिए फोन सीधे सैटेलाइट से जुड़ेगा। ट्राई ने कहा है कि फोन कंपनियों को आगे बनने वाले स्मार्टफोन में इन फ्रीक्वेंसी को सपोर्ट करने वाले मॉड्यूल लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
- मोबाइल नेटवर्क के स्पेक्ट्रम से: सैटेलाइट कंपनियां टेलीकॉम ऑपरेटरों को पहले से आवंटित 600, 700, 800, 900, 1800 और 2100 मेगाहर्ट्ज बैंड का इस्तेमाल कर सकेंगी, लेकिन इसके लिए संबंधित ऑपरेटर की सहमति जरूरी होगी।
ग्राहक जुड़ेंगे टेलीकॉम कंपनी से ही
ट्राई ने ‘सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क (SCN) प्रोवाइडर’ नाम की नई ऑथराइजेशन श्रेणी बनाने की सिफारिश की है। इसके तहत सैटेलाइट कंपनियां आम ग्राहकों को सीधे सेवा नहीं बेचेंगी, बल्कि जियो, एयरटेल और वोडाफोन आइडिया जैसी अधिकृत कंपनियों को नेटवर्क क्षमता देंगी। प्रभात खबर के मुताबिक हर मौजूदा फोन में यह सुविधा चलेगी, इसकी गारंटी नहीं है; एमएसएस आधारित सेवा के लिए नए हार्डवेयर की जरूरत पड़ सकती है।
स्टारलिंक पर सरकार का रुख
इसी बीच समाचार एजेंसी एएनआई ने सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया कि देश में सैटेलाइट इंटरनेट के लिए जियो, वनवेब और स्टारलिंक को लाइसेंस मिल चुका है। सूत्रों के मुताबिक सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज सबसे पहले वनवेब ने, फिर जियो ने और सबसे आखिर में स्टारलिंक ने जमा किए। सेवा शुरू होने से पहले सुरक्षा शर्तें पूरी होना और स्पेक्ट्रम आवंटन जरूरी है। सितंबर 2026 में डिजिटल संचार आयोग ने सैटेलाइट सेवाओं के लिए समायोजित सकल राजस्व (AGR) का 5 प्रतिशत स्पेक्ट्रम शुल्क रखने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, पर अंतिम मंजूरी बाकी है।
(स्रोत: प्रभात खबर, लाइव हिंदुस्तान, ANI)


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